वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य इतवार

प्रवेश-अग्रस्तवः

प्रभु कहते हैं, “मैं अपनी प्रजा का मुक्तिदाता हूँ। यदि वे संकट में मेरी दुहाई देंगे, तो मैं उनकी दुहाई सुनूँगा और सदा के लिए उनका प्रभु बना रहूँगा।”

पु० हम में से कई लोगों की सोच है कि सेवा करना नीच या छोटे लोगों का काम है और ये मनुष्य को छोटा बनाता है। नम्रता मानव की कमजोरी का चिह्न है। दुनियाई दृष्टिकोण से शायद ये सही हो सकता है पर हम खीस्तीयों और ईश्वर भक्तों के लिए ये सोच गलत है। आज के पाठों में हमें बताया जायेगा कि वास्तव में बड़ा या महान कैसे बना जा सकता है। येसु ईश्वर का बेटा दीन बनकर इस जगत में आया। वे अपने शिक्षा और जीवन से सेवा और नम्रता का पाठ पढ़ाया। अपने अनुयायियों को आदेश दिये – “मैंने तुम्हें उदाहरण दिया है जिससे जैसा मैंने तुम्हारे साथ किया है वैसा ही तुम भी किया करो।” आज हम गौर करें येस सेवा और नम्रता का जो उदाहरण हमारे समक्ष रखे क्या हम उसका पालन करते हैं? क्या हमारा सोच और येसु की सोच में कुछ समानता है? अगर नहीं तो अपने इस कमजोरी और अन्य सभी पापों के लिए दयालु परमेश्वर से क्षमा माँगें और अपने को इस पूजन विधि में भाग लेने के लिए योग्य बनायें।

महिमागान लिया जाता है।

संगृहीत प्रार्थना

हे ईश्वर, तूने सिखाया है कि सारी धर्मसंहिता का सार तेरे तथा पड़ोसी के प्रेम में निहित है। तेरे इस प्रेम के नियम का पालन कर हम अनंत जीवन प्राप्त करें। ऐसी कृपा कर, हमारे प्रभु तेरे पुत्र येसु खीस्त के द्वारा, जो तेरे तथा पवित्र आत्मा के संग एक ईश्वर होकर युगानुयुग जीते और राज्य करते हैं।

पहला पाठ

प्रज्ञा ग्रंथ में विधर्मी एक ईश्वर- भक्त की निंदा करते हैं। वे उस पर अत्याचर करते तथा उसको प्राणदण्ड देने का विचार करते हैं। यह सब शास्त्रियों द्वारा येसु के अपमान का पूर्वाभास है।

प्रज्ञा – ग्रंथ 2:12,17-20

_” हम उसे घिनौवनी मृत्यु का दंड दिलायें।” विधर्मी आपस में कहते थे, “

हम धर्मात्मा के लिए फंदा लगायें, क्योंकि वह हमें परेशान करता है और हमारे आचरण का विरोध करता है। वह हमें संहिता भंग करने के कारण फटकारता है और हम पर अपनी परंपराओं को त्याग देने का अभियोग लगाता है। हम यह देखें कि उसका दावा कहाँ तक सच है; हम यह पता लगायें कि अंत में उसका क्या होगा। यदि वह धर्मात्मा ईश्वर का पुत्र है, तो ईश्वर उसकी सहायता करेगा और उसे उसके विरोधियों के हाथ से छुड़ायेगा। हम अपमान और अत्याचार से उसकी परीक्षा लें, जिससे हम उसकी विनम्रता जान जायें और उसका धैर्य परख सकें। हम उसे घिनौवनी मृत्यु का दंड दिलायें, क्योंकि उसका दावा है कि वह सुरक्षित ही रहेगा”।

यह प्रभु की वाणी है।

भजन स्तोत्र 53:3-6, 8

अनुवाक्यः प्रभु मेरे जीवन का आधार है।

1. हे ईश्वर! अपने नाम द्वारा मुझे बचा; अपने सामर्थ्य से मुझे न्याय दिला। हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना सुनने और मेरे शब्दों पर ध्यान देने की कृपा कर।।

2. घंमडी मुझे घेरते हैं और कुकर्मी मुझे मारना चाहते हैं। वे ईश्वर की उपेक्षा करते हैं।

3. अब, ईश्वर स्वयं मेरा सहायक है, प्रभु मेरे जीवन का आधार है। मैं सारे हृदय से तुझे बलिदान चढ़ाऊँगा।

मैं तुझे धन्य कहूँगा, क्योंकि तू भला है।

दूसरा पाठ

जब तक मनुष्य अपने स्वार्थ, ईर्ष्या तथा अन्य वासनाओं का दमन नहीं करते, तब तक समाज में लड़ाई-झगड़े होते रहेंगे। जब तक हम मसीह की आज्ञाओं पर नहीं चलते, हमारे बीच अशांति बनी रहेगी।

संत याकूब का पत्र 3:16-4:3

“धार्मिकता शांति के क्षेत्र में बोयी जाती है और शांति स्थापित करने वाले उसका फल प्राप्त करते हैं।”

जहाँ ईर्ष्या और स्वार्थ है, वहाँ अशांति और हर तरह की बुराई भी पायी जाती है। किन्तु ऊपर से आयी हुई प्रज्ञा सब से पहले निर्दोष है, और वह शांतिप्रिय, सहनशील, विनम्र, करूणामय, परोपकारी, पक्षपातहीन और निष्कपट भी है। धार्मिकता शांति के क्षेत्र में बोयी जाती है और शांति स्थापित करने वाले उसका फल प्राप्त करते हैं। आप लोगों में द्वेष और लड़ाई-झगड़ा कहाँ से आता है? क्या इसका कारण यह नहीं है कि आपकी वासनाएँ आपके अंदर लड़ाई करती है? आप अपनी लालसा पूरी नहीं कर सकते और इसलिए हत्या करते हैं। आप जिस चीज़ की ईर्ष्या करते है, उसे नहीं पा सकते हैं और इसलिए लड़ते-झगड़ते हैं। आप प्रार्थना नहीं करते हैं, इसलिए आप लोगों के पास कुछ नहीं है। जब आप माँगते भी हैं, तो इसलिए नहीं पाते हैं कि अच्छी तरह से प्रार्थना नहीं करते। आप अपनी वासनाओं की तृप्ति के लिए धन की प्रार्थना करते हैं।

यह प्रभु की वाणी है।

जयघोष

अल्लेलुया, अल्लेलुया! प्रभु कहते हैं, – “मेरी भेटें मेरी आवाज़ पहचानती हैं। मैं उन्हें जानता हूँ और वे मेरा अनुसरण करती है।” अल्लेलुया!

सुसमाचार

येसु मसीह ‘अपनी सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने और बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आये हैं। उनका अनुकरण करते हुए हमें भी अपने भाइयों, विशेष रूप से दरिद्र तथा निस्सहाय लोगों की सेवा करनी चाहिए।

संत मारकुस के अनुसार पवित्र सुसमाचार 9:30-37

“मानव पुत्र पकड़वा दिया जायेगा। …..यदि कोई पहला होना चाहे, तो वह सब का सेवक बने।” और उसके शिष्य वहाँ से चल कर गलीलिया पार कर रहे थे। येसु नहीं चाहते थे कि किसी को इसका पता चले, क्योंकि वह अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे। येसु ने उन से कहा, “मानव पुत्र मनुष्यों के हवाले कर दिया जायेगा। वे उसे मार डालेंगे

और मार डाले जाने के बाद वह तीसरे दिन जी उठेगा”। शिष्य यह बात नहीं समझ पाते थे, किन्तु येसु से प्रश्न करने में उन्हें संकोच होता था। वे कफ़रनाहूम आये। घर पहुँच कर येसु ने शिष्यों से पूछा, “तुम लोग रास्ते में किस विषय पर विवाद कर रहे थे?” वे चुप रह गये, क्योंकि उन्होंने रास्ते में इस पर वाद-विवाद किया था कि हम में सब से बड़ा कौन है। येसु बैठ गये और बारहों को बुला कर उन्होंने उन से कहा, “यदि कोई पहला होना चाहे, तो वह सब से पिछला और सब का सेवक बने”। उन्होंने एक बालक को शिष्यों के बीच खड़ा कर दिया और उसे गले लगा कर उन से कहा, “जो मेरे नाम पर इन बालकों में से किसी एक का स्वागत करता है, वह मेरा ही स्वागत करता है और जो मेरा स्वागत करता है, वह मेरा नहीं, बल्कि उसका स्वागत करता है, जिसने मुझे भेजा है।”

यह प्रभु का सुसमाचार है।

पु. मैं स्वर्ग और पृथ्वी के सृष्टिकर्ता

सबः सर्वशक्तिमान पिता ईश्वर, और उसके इकलौते पुत्र अपने प्रभु येसु ख्रीस्त में विश्वास करता (करती )हूँ, (जो पवित्र आत्मा के द्वारा ….से जन्मा’ शब्दों तक एवं अंतर्विष्ट सब लोग नतमस्तक होते हैं।)जो पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया, कँवारी मरियम से जन्मा, पोतस पिलातुस के समय दु:ख भोगा, क्रूस पर चढ़ाया गया, मर गया और दफनाया गया; वह अधोलोक में उतरा, और तीसरे दिन मतकों में से फिर जी उठा; वह स्वर्ग में आरोहित हुआ और सर्वशक्तिमान् पिता ईश्वर के दाहिने विराजमान है; वहाँ से वह जीवितों और मुतकों का न्याय करने आएगा। मैं पवित्र आत्मा, पवित्र काथलिक कलीसिया, धर्मियों की सहभागिता, पापों की क्षमा, देह का पुनरूत्थान और अनंत जीवन में विश्वास करता (करती) हूँ। आमेन।

विश्वासियों के निवेदन

पृ० प्यारे भाई-बहनों, येस् दीन मानव बन कर इस दुनिया में आये और जरूरतमंदो की मदद की। अतः हम भी दीन बनकर अपनी और दूसरों की जरूरतों के लिए प्रार्थना करें और कहें

सबः हे पिता, हमारी प्रार्थना सुन।

1. संत पिता फ्रांसिस, अपने धर्माध्यक्षों, पुरोहितों धर्मसमाजियों और धर्मबहनों के लिए प्रार्थना करें कि वे येसु के पद चिह्नों पर चल सकें। इसके लिए पिता परमेश्वर से प्रार्थना करें।

2. सभी खीस्तीय विश्वासियों के लिए प्रार्थना करें कि वे नम्रता और सेवाभाव द्वारा महान और बड़ा बन सकें। इसके लिए निवेदन करें।

3. सभी बीमार लोगों की देख-रेख करने वाले व्यक्तियों के लिए प्रार्थना करें कि ईश्वर का सार्मथ्य उन पर हो जिसके प्रभाव से वे चंगे हो सकें। इसके लिए पिता परमेश्वर से प्रार्थना करें।

4. दैनिक मजदूरी करने वाले लोगों के लिए प्रार्थना करें। ईश्वर उनको भला चंगा रखे, काम करने की शक्ति दे जिससे वे अपने कामों को ठीक से कर सके और अपने परिवार की जरूरतों को पूरा कर पायें। इसके लिए पिता ईश्वर से प्रार्थना करें।

5. देश के नेताओं और अधिकारियों के लिए प्रार्थना करें कि वे ईमानदारी और सच्चाई के साथ अपने कामों को कर पायें। इसके लिए निवेदन करें।

पु. हे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर तेरे लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। तुझ पर आश्रित होकर अपनी ये तुच्छ प्रार्थनाओं को तुझे चढ़ाते हैं इन्हें सुन और पूरा कर तेरे पुत्र येसु खीस्त के द्वारा। आमेन।

अर्पण-प्रार्थना

हे प्रभु, अपनी प्रजा के दान कृपापूर्वक ग्रहण कर। जिस सत्य को हम श्रद्धाभाव से स्वीकार करते हैं, उसे स्वर्गिक संस्कारों द्वारा प्राप्त भी करें। हम यह प्रार्थना करते हैं, अपने प्रभु खीस्त के द्वारा।

कम्यूनियन-अग्रस्तव

हे प्रभु, तूने अपना विधान इसलिए घोषित किया है कि हम उसका पूरा-पूरा पालन करें। मैं तेरे आदेशों को पूरा करने में सदा दृढ़ बना रहूँ।

स्तोत्र 119(118):4-5 अथवा

योहन 10:14 प्रभु कहते हैं, “भला गड़ेरिया मैं हूँ। मैं अपनी भेड़ों को जानता हूँ और मेरी भेड़ें मुझे।” कम्यूनियन के बाद प्रार्थना

हे प्रभु, तूने इस संस्कार द्वारा हमारा नवनिर्माण किया है। कृपापूर्वक हमारी सहायता कर कि हम संस्कार तथा आचरण में तेरी मुक्ति प्राप्त कर सकें। हमारे प्रभु खीस्त के द्वारा।

चिन्तन

मानव स्वभाव से महत्वकांक्षी होता है। दुनियाई तरीके से वह बड़ा और महान बनना चाहता है। वह पद, पहचान, आत्म-सम्मान और अपने अधिकार का भूखा होता है। वह धन-दौलत और अपने बड़प्पन से उस भूख को मिटाना चाहता है। पर क्या ये चाहत हम खीस्त अनुयायियों के लिए उचित है? आज के पाठ हमें बताते हैं कि कौन लोग इस तरह की सोच रखते और क्यों उसे किसी भी तरीके से पूरा करना चाहते हैं। आज का पहला पाठ प्रज्ञा ग्रंथ से पढ़ा गया जो पुराने व्यवस्थान का सबसे आखिरी में येसु के आने के 50 साल पहले लिखी गयी किताब है। ये विधार्मियों द्वारा धार्मियों को परेशान और विरोध करने की सोच को बताता है। इस संसार में दो मत वाले लोग मिलेंगे। एक ईश्वर को मानने वाले और दूसरा उसे नहीं मानने वाले। जो ईश्वर को नहीं मानते उनकी धारणा रहती है कि मृत्यु के बाद कोई जीवन नहीं होता है। उनके लिए सही गलत, अच्छा बुरा, नैतिक अनैतिक का कोई मायने नहीं रहता है। इसलिए वे किसी भी तरीके से धन-दौलत, पद, शक्ति, मान सम्मान आदि प्राप्त कर उसका सुख पाना चाहते हैं। यही दूसरे शब्दों में विधर्मी कहलाते है। ठीक उल्टा जो ईश्वर को मानते हैं, उनकी सोच होती है। उनके लिए ये जीवन मृत्यु के बाद की जीवन की तैयारी होती है। वे ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करके और पाप से दूर रहकर, पद, धन-दौलत और महत्वकांक्षी की मोह को त्याग कर आगे के जीवन की तैयारी करते हैं। उनका मानना होता है कि ईश्वर उनका सहायता करेगा, उसके सब विरोधियों के हाथ से छुड़ायेगा और मरने पर भी उनको सुरक्षित रखेगा और अनंत जीवन प्रदान करेगा। आज का पहला पाठ अपने को परखने के लिए हमे चुनौती देता है। हमारी दैनिक जीवन जीने की सोच क्या होती है? क्या हमारा सोच विधार्मियों की तरह केवल वर्तमान तक ही सीमित है? या प्रभु भक्त की तरह वर्तमान के जीवन को भविष्य की तैयारी के लिए ईश्वर पर भरोसा करते हए जीते

आज के दूसरे पाठ में संत याकुब हमें अपने व्यवहार पर गौर करने के लिए निमत्रंण देते हैं। अपने चारों ओर बहुत शोर-शराबा, हल्ला-गुल्ला सुनाई देता है। अधिकतर लोग अपने में मस्त और बेकार की चीजों में व्यस्त रहते हैं। छोटी-छोटी बातों में ईर्ष्या और स्वार्थ के कारण लड़ाई-झगड़ा होता है। ईश्वर पर आश्रित नहीं होने के कारण अपनी जरूरतों के लिए प्रार्थना नहीं करते हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो दूसरो का ख्याल रखते और परवाह करते हैं। ऐसे माहौल में क्या धार्मिकता बोयी जा सकती है? क्या शांति को महसूस करके उसके फल का आनन्द प्राप्त किया जा सकता है? अगर प्रार्थना करते भी हैं तो अपने स्वार्थ और वासनाओं से प्रेरित होकर। क्या ऐसी भावना से हमारी प्रार्थना सुनी जायेगी? क्यों हमारे बीच अशांति होती है? क्यों आपसी मनमुटाव होता है? इन चीजों पर चिंतन करें।

आज के सुसमाचार में येसु अपने शिष्यों को महान बनने के तरीका बताते हैं। येसु को ये पता था कि उनके मानवीय जीवन का अन्त आ रहा है। इस बात को अपने शिष्यों के हृदय में अंकित कर देना चाहते थे इसलिए करीब तीन बार अपने दु:खभोग और मृत्यु के बारे में उन्हें स्पष्ट शब्दों में बता चुके थे। पर वे इसे नहीं समझ सके। ये जानकर कभी-कभी हमें हैरानी होती है कि कैसे ये हो सकता है। वास्तव में शिष्यगण पहले से ही अन्य महत्वकांक्षी इरादों में खोये हुए थे। वे वाद-विवाद कर रहे थे कि उनमें कौन सबसे बड़ा है।ये स्थिति बड़ा बनने की राज को बताने के लिए येसु के लिए सुनहरा अवसर प्रदान किया। येसु कहते हैं “जो पहला होना चाहता है, वह सब से पिछला और सबका सेवक बने”। ये बात दुनियाई दृष्टिकोण से अटपटा है। क्योंकि दुनिया हमें बताती है कि बड़ा या पहला होने के लिए मालिक बनना होता है, दूसरों पर अधिकार जताना होता है। उसके लिए धन, पद और शक्ति से संपन्न होना होता है। येसु की शिक्षा हमेंशा आध्यात्मिकता पर आधारित होती थी। सांसारिक सोच उनके लिए अधिक महत्वपूर्ण नहीं होते थे। वर्तमान से अधिक भविष्य के लिए वे हमें अगाह करते थे। येसु के ये कथन ईश्वर की दृष्टि में पहला और बड़ा होने की बात करता है। इसी बात को येसु हमारे लिए अपने सम्पूर्ण जीवन से जी करके दिखाये। वे दीन मानव बनकर इस धरती पर आये। वे हमेशा दीन, लाचार, मजबूर, जरूरतमंद व्यक्तियों के साथ रहे और उनकी मदद और सेवा की। इतना ही नहीं अपने सेवकों के पैर धोये और कहा अगर मैं तुम्हारा पैर न धोऊँ तो तुम्हारा मेरे साथ कोई संबंध नहीं। इसलिए जो येसु से संबंध रखना चाहते हैं उनको उसकी शिक्षा और नमूनों पर चलना होगा। महान बनने के लिए नम्रता और सेवा का जीवन जीना होगा। बच्चों के समान सरल और नेक दिल वाला व्यक्ति होना होगा। क्या हम ये सब करने के लिए तैयार हैं? इस पवित्र युखारिस्त के द्वारा ईश्वर हमें दीन और सरल बनाये और सेवा की भावना से हमें ओत-प्रोत कर दे। आमेन।

(फा० फिलिप मिंज)

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